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Shri Ramesh Baba Ji Maharaj

From Barsana India

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Satsang Ke Phool
क्लेश
Wednesday, 03 June 2009 08:02
सब के सब क्लेश केवल एक श्रवण मात्र से ही नष्ट हो जाते है, और भक्त्ति की सहज में ही प्राप्ति हो जाती है ! हर क्षण कृष्ण गुनगान, कथा, कीर्तन, का श्रवण करते रहो !परन्तु कैसे ? श्रवण करो तो परीक्षत जी की तरह ! जिन्होंने सात दिन ऐसी लगन से कथा सुना कि वो ना पीना ही भूल गए ! जब ख़ुद शुकदेव जी ने कहा कि कुछ ले लो ! तो बोले कि हमे भोजन तो दूर पानी पीना भी बाधा लग रहा है ! ऐसी निष्ठां चाहिए सुनने में !
 
प्रभु की कृपा
Thursday, 23 April 2009 11:59
जब विशवास पहाड़ बन जाता है तब विपतियो के तूफान हवा में उड़ जाते है !  अनंत दुःख मिलने पर भी धर्म नही छोड़ना चाहिए !  समस्त ताप भगवान के काल शक्त्ति से मिलते है तांकि जीव निर्मल हो जाए !  ये प्रभु की कृपा है ! प्रभु जान बुझकर हमे निराश कर देते है, भगवान हमारी परीक्षा लेते है !  अत उनके हर कर्म में प्रसन्न रहना सीखो !
Last Updated on Wednesday, 13 May 2009 11:48
 
वास्तविक प्रेम
Wednesday, 22 April 2009 13:57
 वास्तविक प्रेम अपनी संतुष्टि में नही अपितु स्वामी की तुष्टि में है !  जहाँ सम्मान की आशा है वहाँ प्रेम तो हो ही नही सकता !  प्रेमी कोई चाह लेकर नही चलता वो तो अपने प्रेमी के सुख  को लेकर चलता है !  भगवान भी अपना गर्व नही रखते वे भी प्रेम का आधीन होकर नृत्य करते है, फ़िर साधारण व्यक्ति की तो बात ही क्या ? 
Last Updated on Thursday, 23 April 2009 12:06
 
श्री कृष्ण ब्रज में टेडे क्यो
Wednesday, 22 April 2009 13:46
श्री कृष्ण ब्रज में टेडे क्यो बने ?  जहाँ प्रेम होता है वहां टेडा पन अवश्य रहेगा !  प्रेम सर्प की भांति होता है !  सर्प कभी भी सीधा नही चल सकता !  हास परिहास प्रेम में ही सम्भव है !  रस विस्तार प्रेम में ही सम्भव है !  गोपिया जी भर के श्री कृष्ण को गालिया देती थी परन्तु उनको अपने ह्रदय से नही निकल पाती थी क्योंकि लड़ना खीजना उसी से होता है जिस से प्रेम होता है !  श्री कृष्ण प्रेम में गोपियों ने अपने को मिटा दिया !
Last Updated on Thursday, 23 April 2009 12:16
 
अविलम्ब फल
Friday, 13 March 2009 20:39
भगवान का नाम अविलम्ब फल देता है !  यदि कोई विवशता में भी श्री हरि का नाम लेता है और उसकी महिमा नही समझ रहा है फ़िर भी ये निश्चित है कि उस ताप से वह छुट जायेगा !
Last Updated on Thursday, 23 April 2009 12:01
 
अपने को समझना
Sunday, 08 March 2009 11:59
अपने को समझना ही कठिन है संसार में ! आँख बाहर देख सकती है, पर स्वयम को नही देख सकती ! हमारी आध्यात्मिक यात्रा तभी प्रारम्भ होती है जब हम अपने को देखना शुरू कर देते है ! अपने को देखने पर कमिया दिखेंगी ! अपनी कमियों पर संताप करने बाले का कभी नाश नही होता ! ऐसे लोग महापुरश बन जाते है ! 
Last Updated on Sunday, 08 March 2009 11:59
 
संग
Sunday, 08 March 2009 11:58
व्यक्ति जैसा संग करता है, वह अपनी रूचि के अनुसार करता है ! यदि कोई कामी का संग करता है तो यह सिद्ध है कि वह स्वयम कामी है ! हमारी जैसी प्रकृति है हम वैसा ही संग ढूंढ़ते है ! जिसकी रूचि श्री कृष्ण में है वो जैसे गंगा का पानी केवल समुन्द्र की ओर जाता है वैसे ही उस भक्त्त का वहाव श्री कृष्ण के लिए ही होगा अन्य किसी ओर के लिए नही ! संग किया जाए तो अच्चुत का ही किया जाए जो कभी भी हमसे अलग नही होता ! संसार का संग तो अब नही तो थोडी देर में छुट जाएगा!
Last Updated on Sunday, 08 March 2009 11:58
 
कामावरण
Sunday, 08 March 2009 11:57
हमारे चारो ओर अंदर बाहर सर्वत्र ब्रह्म है फ़िर भी हमे दिखायी नही दे रहा है ! जैसे किसी घोर अन्धकार में रखे हुए पानी को जीव कितना भी प्यासा हो परन्तु प्राप्त नही कर सकता जब तक प्रकाश नही होगा ! वैसे ही हमारा अंतकरण घोर अंधकार में है ! प्रभु पास होते हुए भी नही दीखते है ! अन्धकार सिर्फ़ एक ही है कामावरण ! कामावरण ही प्रभु के स्वरूप को नही देखने देता है !
Last Updated on Sunday, 08 March 2009 11:59
 
निरिक्षण
Sunday, 08 March 2009 11:57
ज्ञान चक्षुओं से सतत मन का निरिक्षण करते रहना चाहिए ! जागते हुए चोर नही आयेगा ! जागते हुए दोष उत्पन्न नही होगा ! मन का शांत होना बाहुत जरुरी है ! जब हमारा मन शांत नही है उस समय हम प्रभु से दूर है ! जिसका मन जहा है वही उसका निवास होता है ! इसलिए मन की बीमारी को पकड़ना ही असली साधन है ! 
Last Updated on Sunday, 08 March 2009 11:58
 
चिन्तन
Sunday, 08 March 2009 11:56
जीव चिन्तन करके अपनी प्रकृति का निर्माण स्वयम जैसा चाहे कर सकता है ! भगवान का स्मरण करेगा तो भगवदकार चित वृति हो जायेगी ! विषयों का चिन्तन करेगा तो विष्याकर वृति हो जायेगी ! 
 
साधना का मूल केंद्र
Sunday, 08 March 2009 11:56
साधना का मूल केन्द्र या मूल लक्ष्य मन होना चाहिए वरना साधन फल नही देगा ! किसी व्यक्ति ने कोटरी स्थित सर्प को मारने के लिए पुरे पेड़ को काट दिया तो क्या उससे सर्प मर गया ! नही, सर्प नही मरा ! उसी तरह मन का नियन्त्रण यदि नही हुआ तो साधन व्यर्थ चला जाएगा ! कोई भी साधन बिना मन के नही हो सकता ! किसी भी तरह अपने मन को प्रभु में लगा दो ! मन प्रभु में लगते ही प्रभु भक्त्त के सामने खड़े हो जायेंगे !
 
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Shri Radha Rani Braj Yatra

Shri Radha Rani Braj YatraShri Radha Rani Braj Yatra is 40 days long spiritual journey around Braj Mandal. This yatra is completely FREE and anybody can take part in this event.

Shri Yamuna Ji

Shri Yamuna JiShri Yamuna Ji is one of the most sacred rivers in India. It is considered as Patrani of Shri Krishna. However, it has been declared as dead river because of pollution.

Mountains of Braj

Shri Radha Rani Braj YatraThe famous mountains of primary sites of pilgrimage were given space in Braj. All the visible mountains in Braj represent these sites of great religious and ecological importance.
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