“दान गढ़”
बरसानें में दान लीला दो जगह होती है | सांकरी गली में तो दान लीला होती है लेकिन दानगढ़ पर रति दान लीला होती है | रति मानें प्रेम दान | श्री ठाकुर जी राधा रानी से प्रेम दान यानि रति दान मांगते हैं | कैसे मांगते है ? उनके चरणों में प्रार्थना करके |
दान मंदिर प्रार्थन मन्त्र
दानवेषधरायैव दध्युपास्याभिलाषिणे |
राधानिर्भत्सितायैव कृष्णाय सततं नमः|
हे दान वेषधारी! हे दघि, दुग्ध अभिलाषा करनें वाले, श्री राधाकर्त्रिक भतिर्सत श्री कृष्ण आपको नमस्कार |
साँकरी खोर और विलास गढ़ से विपरीत दिशा में दानगढ़ है "रतिदान स्थल" | राजदान व छद्म दान लीला की स्थली हैं | रति मानें प्रेम दान | श्री ठाकुर जी राधा रानी से प्रेम दान यानि रति दान मांगते हैं | कैसे मांगते है ? उनके चरणों में प्रार्थना करके |
एक पद है कि राधा रानी के चरणों को स्पर्श करके, चरणों को छू करके, वो दान मांगते हैं | ठाकुर जी कह रहे हैं कि हे राधे आप तो बड़ी दानी हैं, महादानी हैं | बरसानें में जो भी आता वो बरसानें से खाली हाथ नहीं जाता है | राधा रानी को इस पद में महादानी कहा गया है | महादानी बहुत बड़ा दानी होता है |
उससे बड़ा और कोई दाता नहीं होता | जिस पर श्री राधा रानी प्रसन्न हो जाती हैं उसको सिर्फ रास रस और विलास रस देती हैं | इसको ठाकुर जी नहीं दे सकते | ठाकुर जी स्वयं श्री राधा रानी से रास रस और विलास रस मांगते हैं | ठाकुर जी कहते हैं कि हे महादानी राधा आप हमारे ऊपर कृपा कर दो |
महादानी वृषभानु किशोरी तुव कृपावलोकन दान दै री
तृषित लोचनि चकोर मेरे तुम बदन इंदु किरनि पान दे री
सब विधि सुघर सुजान सुन्दरी सुनि लै विनती कान दे री
गोविन्द प्रभु पिय चरन परसि कह्यो जाचक को तुव मान दे री ||
हे राधे हमारे नेंत्र प्यासे हैं इसलिये पहला दान क्या है ? आप अपना ये घूँघट हटा दें ताकि हमको दर्शन हो सके | आप तो बड़ी चतुर हैं | हमारी विनती को आप ही समझती हैं | ये बात कहकर ठाकुर जी नीचे चरणों में गिर गये और बोले हमारा मान रख लो आप | सब के सामनें हम आपके चरणों में हैं | अब आप अपना मान तोड़ दो और हम को रस दान दो | ये दान गढ़ की लीला है |
एक दान लीला का पद भी सुना रहे हैं | ब्रज गोपियाँ और श्री कृष्ण का संवाद है | दान लीला में गोपियाँ श्री कृष्ण से कहती हैं कि तुम दान लेते हो ? छेड़ते हो ? पराई वस्तु को ग्रहण करना पाप है | तुमनें इतनें पाप किये हैं इसीलिए तुम काले हो गये हो | इस पाप से तुम कैसे छूटोगे नन्द लाल ?
( लाला तब ही ते काले भये --- भजन )
अरे कन्हैया इस पाप के बोझ से तुम कैसे छूटोगे ? हमनें तुम को कभी भजन करते देखा नहीं | नहाते धोते देखा नहीं | तुम गंवार हो | तुम्हारा ये चोरी-चारी का पाप कैसे जायेगा ? श्याम सुन्दर बोले अरे मेरे जैसा धर्मात्मा कोई होगा ही नहीं | मैं जैसा धर्म करूँ, भजन करूँ, स्नान करूँ वैसा कोई भी संसार में गोपियो ना कर सके | हे गोपियों गौ रज गंगा से बड़ा कोई तीर्थ है क्या ?
स्वयं श्री कृष्ण नें कहा है ब्रह्मवैवर्त पुराण में कि सभी देवता गाय के अंग में हैं, सभी तीर्थ गाय के खुर में हैं और लक्ष्मी गोबर में हैं | गौ रज से जो तिलक कर लेता है तो सब तीर्थों का स्नान हो जाता है | श्याम सुन्दर बोले मै निरन्तर गाय माता के नाम जपूँ | ओ काली, ओ धोरी! हमसे पवित्र कौन होगा ?
श्री जी बोलीं पर ये सारा राज तो हमारे बाबा वृषभानु जी का है | तुमको बरसाने में हमने बसाया है और अब तुमको बसाने का हम दंड भोग रही हैं | तुम तो लुटरे हो | कोई चोर को अगर बसाएगा तो वो उसी के घर में चोरी करेगा | हमारे बाबा नें तुम को बसाया और तुम हमारे ही घर में चोरी करनें लग गये |
पहले ब्रज की पगड़ी वृषभानु वंश में थी लेकिन महीभान जी नें अपनी इच्छा से और प्रेम से पगड़ी दे दिया तुम्हारे बाबा को वरना ये सारा ब्रज वृषभानु जी का था | राधा रानी बोलीं कि हमारे बाबा नें तुम्हारे बाबा को पगड़ी दिया और ये हम उसी का फल भोग रहीं हैं | ब्रज की रक्षा हमनें की और तुम आराम से यहाँ मौज कर रहे हो ? सच बात तो माननी पड़ेगी | श्याम सुंदर बोले हाँ ये सारा ब्रज जो है तुम्हारे बाबा का है | लेकिन एक बात सुनो हे राधे सब देश तो वृषभानु जी की लाडली बेटी का है यानि कि तुम्हारा है | तुम उनकी इतनी लाडली हो कि जब हमारे साथ सम्बन्ध हुआ तब हमें सब दहेज में दे दिया|
दानगढ़ के पास जयपुर मंदिर है | आगे श्री जी और र मध्म में वर्तमान विग्रह का प्राकट्य स्थल है | आगे भानुगढ़ पर श्री जी का मंदिर है जहाँ ब्रह्मा जी द्वारपाल बने, लीला आस्वादन किया करते हैं | वहीं श्री जी के वर्तमान विग्रह के छोटे - छोटे चरण चिन्ह हैं | श्री जी की काम धेनु गाये के थन भी हैं |
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