वृषभानु कुण्ड यहां महाराज वृषभानु जी नित्य स्नान करते थे | इसे भनोखर भी कहते हैं |
“भानु सरोवर”
प्रार्थना मन्त्र
निर्धूतकिलिवशायैव गोपराजकृताय ते !
वृषभानुमहाराजकृताय सरसे नमः !
भानु सरोवर जो वृषभानु जी का सरोवर है | उस को प्रणाम करने से और उस में स्नान करने से किल्विष पाप चला जाता है | वृषभानु महाराज जी के द्वारा निर्मित है ऐसे सरोवर को हम प्रणाम करते हैं |
इसके समीप में 'कीर्ति सरोवर' है|
“कीर्ति सरोवर”
कीर्तिश्च यत्र गोपीभिः सह स्नानं समाचरेत् |
सौभाग्यसुतधान्यादिसुखमाप्नोति मानवः||
यतो कीर्तिसरःख्यातं सकलेष्टप्रदायकं |
कीर्ति देवी जहाँ गोपियों के साथ नित्य स्नान करती थीं वह कीर्तिदा सरोवर हैं | सौभाग्य,सुत,धनादि सुख और समस्त मनोरथ को देने वाला है
ततो कीर्तिसरः स्नानाचमनप्रार्थनमन्त्रः|(वृहत्पाराशरे)
नमः कीर्ति महाभागे सर्वेषां गोब्रजौकषां |
सर्वसौभाग्यदे तीर्थे सुकीर्तिसरसे नमः ||
हे कीर्ति माहाभागे ! वृषभानु गोप और समस्त ब्रजवासियों को समस्त सौभाग्य देने वाली ! हे कीर्ति सरोवर आपको नमस्कार |इस मन्त्र का पाठ कर ९ बार मज्जन,आचमन द्वारा स्नान करें तो समस्त सुख सम्पति लाभ करता है |
श्री ब्रज प्रेमानंद सागर :-
कबहुं भान सरोवर तट में झूलैं फूलैं सखी संघट में |
श्री राधा अति मिठ बोलनी पुर उपवन बन खेलन डोलनि
कबहुं सखिन संग लै भीर खेलन जाँई सरोवर तीर
अति सुन्दर जू मृतिका लाइ, सुहथ खिलौना रचती बनाइ |
सदन बनावैं न्यारे न्यारे, तिन में घरैं खिलौना प्यारे ||
ग्रह के सब कारज करैं, खेल मगन कौतिक विस्तरैं |
सब कौं सब जू बांइनौं देंहिं, सब पै तें सब सादर लेंहि ||
टोलनि टोलनि मंगल गावैं, कुंवरिहिं नाना खेल खिलावैं |
कबहूं झूलहिं गहि- गहि तरवर, कबहूँ केलि करैं जल सरवर ||
कबहूं लै जु मीन गति तरैं, जल में महा कुलाहल करैं |
कबहूं जल मुख पर लै सीचैं, कबहूं पाछें रहि दृग मीचैं ||
कबहूँ तोरि जु कमल बगेलैं, तकि तकि तन मारैं यौं खेलैं |
बुडकी लैं जल हीं जलधावैं, भरैं चुहुंटियां अंक लगावैं ||
पुनि जल पैठैं उछरैं ऐसें, मीन करत कौतूहल जैसें |
तन अंगोछि पहिरैं जु निचोल, मिलैं जु अपने अपने टोल ||
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