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अन्धा आँख प्राप्ति को प्रभु की कृपा समझता है !
गरीव धन प्राप्ति को प्रभु की कृपा समझता है !
रोगी निरोग होने को प्रभु की कृपा समझता है !
ये सब धोखा है !
ये प्रभु की कृपा नही है !
प्रभु जिसपे अपनी कृपा करते है उसे अपनी शरण में ले लेते है
और फ़िर अपनी कृपा बरसाते है !
प्रभु कृपा कर के सब आस्कतियो को लुट लेते है !
तव जीव एक मात्र प्रभु का आश्रय ले लेता है !
तब समझो की अब प्रभु की कृपा है !
उनकी कृपा जीव को माया से पार ले जाती है
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संसार की ओर देखने से क्या होगा ?
शरण केवल गोविन्द की लो !
सुख केवल गोविन्द की शरण में है !
संसार की सम्पति धुएं का बादल है, इस से प्यास शान्त नही होगी !
सम्पूर्ण जगत अग्नि का समूह मात्र है !
हम इस में शीतलता देखना चाहते है, यही अज्ञान है !
संसार में अगर कोई शक्त्ति है, तो वह केवल श्री कृष्ण की ही है !
प्रभु सदा मंगल करते है !
उनका क्रोध करना भी वरदान है !
भक्त्त हर परिस्थिति को प्रभु की कृपा समझ कर प्रसन्न रहता है !
इस काली अँधेरी रात्री में श्री कृष्ण ही एक प्रकाश है !
सतत श्री कृष्ण स्मरण बना रहे, तो उनसे हम अलग नही हो सकते !
प्रभु पे विशवास रखो !
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संसारी रूपी अँधेरी रात्रि में श्री कृष्ण स्मरण ही एक प्रकाश है !
सतत श्री कृष्ण स्मरण बना रहे, तो प्रभु से हम अलग नही हो सकते !
स्मृति भंग होने पर प्रभु से दुरी होती है !
हमारे ऊपर श्री कृष्ण कृपा है इसकी क्या पहचान है ?
प्रभु जब कृपा करते है तो रस प्रदान करते है !
भक्त्ति देते है !
जो संसार को प्राणी बड़े बड़े साधनों से नही छूटता,
वह श्री कृष्ण कथा एवम प्रेम से सहज में छुट जाता है !
संसार के ताप में जले हुए प्राणी को
श्री कृष्ण कथा प्रेम एवम जीवन देता है !
उनके विष को अमृत बना देता है !
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दुखो से कभी घबराओ मत !
जहर भी मिले तो प्रेम से पी जायो और अपने प्रेम को कुंदन बनाओ !
अपने प्रेम को मिलन सुख की तृष्णा से या लालसा से अपवित्र मत करो !
अपने प्रेम को पीतल मत बनाओ !
दुखो से क्या घबराना ?
हंसते हंसते ये जहा पी जाओ कुन्ती की तरह
जिसने स्वयम कृष्ण से दुःख मांगे
तांकि एक पल के लिए भी श्री कृष्ण की याद ना विसरे !
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श्याम को भंवरा कहा जाता है !
भंवरा कहाँ रहता है ?
भंवरा कमल के ऊपर रहता है !
जिस ह्रदय में सुंदर भाव होते है, वो ह्रदय कमल बन जाता है !
जिस ह्रदय में दया, क्षमा, मधुरता, आदि सब भाव है !
जिस ह्रदय में सब जीवो से मैत्र भाव है, और किसी से भी द्वेष नही है !
मारने बाले तेरा भी भला और जहर देने बाले तेरा भी भला !
ऐसे ऐसे सुंदर गुणों बाले ह्रदय कमल पे कृष्ण रूपी भंवरा जरुर आयेगा !
अपने आप आयेगा !
( ऐ री मेरो श्याम भवरू मन ला गयो मेरे नैनो में मंडराये रे )
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श्याम सुन्दर की प्रेम डगरिया
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भगवान को देख कर के प्यार नही किया जाता !
भगवान को सुन कर प्रेम किया जाता है !
इस दुनिया में तो आँखों से देखा जाता है !
उस दुनिया में कानो से देखा जाता है !
श्याम सुन्दर की जो प्रेम की डगरिया है वो आँखों से नही दिखायी देती !
सुन कर उस रास्ते पे चला जाता है !
सुनना सीखो !
हर क्षण उनके गुणों को सुनो !
अपने आप तुमको उसका रास्ता मिल जायेगा !
रास्ता ही नही वो ख़ुद ही आ कर तुम्हारे पास बैठ जायेंगे !
प्रभु ने कहाँ था कि मै बैकुंठ में नही रहता !
जहाँ हमारे भक्त्त लोग बड़े स्नेह से गाते है, बस मै तो बही पड़ा रहता हूँ !
इसलिए कथा का श्रवण करना सीखो !
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उसको पाओ जिस को आज तक नही पाया है !
सुख के लिए प्रयतन क्यो करते हो ?
जैसे दुःख बिना बुलाये आता है,
उसी तरह सुख भी जितना तुम्हे मिलना है, अवश्य मिलेगा !
प्रयतन करो तो केवल उसी के लिए करो
जिसको अब तक प्राप्त नही कर सके हो !
संसारी सुख के लिए प्रयतन करके अपनी जिन्दगी को मिटटी में क्यो मिलते हो ?
प्रयतन केवल प्रभु प्राप्ति का करो !
इस से पहले की संसार तुम को छोड़ दे, तुम संसार को छोड़ दो !
अर्थात संसार को अपने मन से निकल दो !
जो वस्तु रहने वाली नही है, उसका संग्रह फ़िर क्यो ?
जो सदा हमारे साथ रहने वाला है, उस को पाओ !
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भक्त्ति क्या है ?
भाव ही तो भक्त्ति है !
भक्त्ति दान क्या है ?
भावना का दान ही भक्त्ति दान है !
साधू कौन है ?
साधू वही है जो प्रभु के प्रति हमारे भाव को बढाता है,
जो हमे प्रभु के प्रति शारदा को बढाता है !
जिस के पास बैठने से हर चीज में ,
सेवा में, प्रभु में, व् भक्त्ति में शारदा व् भाव बढ जाए, वो साधू है !
जिसके पास बैठने से भाव में आभाव आता हो,
उसे उसी समय छोड़ देना चाहिए,
चाहे वो गुरु ही क्यो ना हो !
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संसार का हेतु ही असंतोष है !
असंतोष के कारण ही जीव पाप करता है !
सम्पूर्ण त्रिलोकी के विषय भी एक जीव को तृप्त नही कर सकते !
त्याग ही जीव को तृप्त कर सकता है !
अत भोगी मत बनो !
त्यागी बनो !
इस सत्य को सदा स्मरण में रखो
कि त्रिलोकी का भोग भोगने की बाद भी तुम भूखे ही बने रहोगे !
भोग से तो कभी भी तृप्ति हो ही नही सकती !
जितने भी विषय है, वो तृष्णा रूप है !
तृष्णा कहते ही उसे है जिस में कभी भी प्यास नही बुझती !
अग्नि के पास जाकर सोचो कि हमे शान्ति मिले, तो ये कैसे सम्भव है !
इन वासनाओ को व् विषयो को संतुष्टि से ही समाप्त किया जा सकता है !
जो दैव इच्छा से प्राप्त हो, उस में ही संतुष्ट रहो !
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लगन अगर होती है, तो कार्य प्रभु अवश्य करते है !
दामोदर लीला में जब जब यशोदा श्री कृष्ण को रस्सी से बांधती थी,
तो दो उंगल ही रस्सी छोटी पड़ती थी !
एक उंगल नही, तीन उंगल नही, या चार उंगल नही, सिर्फ़ दो उंगल ही !
दो ही उंगल क्यो ?
बड़ी से बड़ी रस्सी गाँव से लाई फ़िर भी दो उंगल ही छोटी पड़ती थी !
क्यो ?
क्योंकि एक तो जीव और प्रभु के बीच में दो उंगल का ही फर्क है !
प्रभु की हमारे से दो उंगल से ज्यादा दुरी नही है !
दो उंगल दुरी क्या है ?
एक उंगल तो हम में लगन की कमी है या हम में साधन की कमी है !
हर जीव साधन से या लगन से घबराता है !
दूसरी उंगल ये है कि प्रभु ने अपने को ढक रखा है,
जिसके कारण हम प्रभु को देख नही पाते !
जिसके कारण हम प्रभु को जान नही पाते !
परन्तु जैसे ही जब पहली उंगल की कमी हम दूर कर देते है,
तो प्रभु हम पे कृपा करके दूसरी उंगल को भी दूर कर देते है !
प्रभु ख़ुद ही अपने पर्दे को हटा देते है !
दामोधर लीला में पहली उंगल तो यशोदा ने दूर की
उनको बंधने में लगी ही रही कि आज बाँध के ही छोडूंगी !
जब प्रभु ने उसका परिक्षम देखा तो अंत में ख़ुद ही कृपा करके बाँध गए
और दूसरी उंगल को दूर कर दिया !
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जब जीव अपने को देखता है,
तो कोई भी दोष उस के सामने नही आता है !
जब जीव दुसरे को देखता है,
तो दोष के सिवा कुछ नजर नही आता है !
बाहर संसार में दुःख और अभाव ही नजर आता है,
जिससे जीव अशांत रहता है !
इसीलिए हमेशा भगवान में मन लगा कर रखे,
और दुसरो की ओर ना देखे !
बाहर क्या हो रहा है, ये मत सोचे !
असंग संसार से,
और संग भगवान से होना है !
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प्रेम वह वस्तु है
जिसके पीछे ब्रह्म अपनी सता खो देता है !
प्रेम के पीछे चोरी करता है !
प्रेम के पीछे झूठे फल खाता है !
प्रेम के पीछे गालिया खाता है !
प्रेम में छांछ के लिए नाचता है !
लोग काम को प्रेम समझ लेते है, पर काम तो केवल अन्धकार है !
प्रेम सूर्य है !
प्रेम शुद्ध तत्व है !
प्रेमी लेता नही अपितु देता है !
सब कुछ दे देता है !
इसीलिए भगवान प्रेम में बाँध जाते है और भक्त्त के बस हो जाते !
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जब तक हमारे में भय है,
तब तक समझो की हम परमात्मा से दूर है !
अगर हमे भय लग रहा है,
तो इसका मतलब है कि हमारी आस्था प्रभु में विल्कुल नही है !
किसी को सुचना मिल जाए कि उसे भयानक बीमारी लग गयी है,
तो वो बीमारी से तो पता नही कब मरेगा,
परन्तु पहले वो भय के कारण मर जायेगा !
जब तक भगवान के चरणों को हम ग्रहण नही करते है,
तब तक भय आदि होते रहेंगे !
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भक्त्त कभी भी डरता नही है !
जिन्हें प्रभु पे विशवास नही होता, सिर्फ़ वो ही डरते है !
प्रभु के बल पर भक्त्त तो बड़े ही निरपेक्ष होते है !
भक्त्तो पे बड़े बड़े संकट आते है, परन्तु वो संकट उनको निखार देते है !
भक्त्तो के अन्दर जो दृढ़ता होती है,
वह भगवान को अपने वश में कर लेती है !
प्रभु कैसे वश में हो जाते है ?
जब भक्त्त प्रभु के सहारे वेसहरा हो जाता है पुरे संसार से,
ऐसी घडियो में भक्त्त की अतिनाद से प्रभु हिल जाते है !
जब तक जीव की आशा जीव पक्ष से होती है,
वही आशा जीव को भगवान से दूर कर देती है !
जब तक द्रोपदी ने
अपने गुरुजनों, पतियो, या स्वयम के बल का आश्रय लिया,
तब तक चीर नही बढ़ा !
द्रोपदी के बेसहारे होते ही गोविन्द का शव्द पुरा भी नही कह पाई थी
कि साडी का डेर लग गया !
संसार के सब सहरो को त्याग दो,
फ़िर देखो कि प्रभु आते है या नही !
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भगवद गुंणों को बार बार चिन्तन करो !
बार बार चिन्तन करने से ही प्रभु में प्रेम व् भक्त्ति होगी !
रुकमनी जी ने श्री कृष्ण गुंणों को सुना, और उनका चिन्तन किया !
ऐसा करने से उन्हें श्री कृष्ण में प्रेम हुआ,
और फल में उन्हें श्री कृष्ण मिले !
कृष्ण गुण श्रवण समस्त तीर्थो का सार है !
भगवान के गुण मानस पापो या तापो को जला देते है,
और फल में प्रभु से मिला देते है !
प्रेम प्राप्ति व् प्रभु प्राप्ति का सहज मार्ग,
प्रभु गुणों का गान ही है !
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भक्त्ति योग के अतिरिक्त
ओर कुछ भगवान का देना, देना नही है !
भगवान के चरण हमारे ह्रदय में आ जाए, ये ही प्रभु का वास्तविक दान है !
इसकी पहचान ये है
कि हमारे ह्रदय में किसी भी प्रकार की कामना का उदय नही होगा !
यदि कामना ही करनी है तो प्रभु से ही करो !
तांकि सकाम भक्त्त भले ही बन जाओगे,
पर कम से कम व्यभिचार तो नही होगे !
सब तरह से भगवान श्री कृष्ण का ही एक मात्र वरण करना चाहिए !
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जैसे वृक्ष की जड़ में पानी देने से ही,
डाल, पते, फुल, सब सींच जाते है !
वैसे ही जो एक मात्र श्री कृष्ण है उनकी सेवा से आपने आप
माता, पिता, पुत्र, पति, आदि सब सेवा हो जाती है !
किसी भी पेड़ को सींचना है तो उसकी जड़ में पानी दे दो !
जड़ में ना देकर अगर इधर उधर पानी छिड़कोगे,
तो फ़िर वो पेड़ नही बचेगा !
चतुर लोग पेड़ की जड़ में पानी देते है !
उससे पते, फुल, डाल, तने, सब में पानी लग जाता है !
मुख्य प्राण में भोजन देने से,
आपने मुख में कोर, दूध, रोटी, खीर, बगैरह देने से, आंख, नाक, हाथ, पाँव,
सब जगह ताकत पहुंच जाती है !
काएदे से तो खीर आंख को भी खिलानी चाहिए
क्योंकि आंख देखने का काम करती है !
खीर कान पे भी डालनी चाहिए क्योंकि कान सुनने का काम करते है !
नाक में भी खीर डालनी चाहिए क्योंकि नाक सूंघने का काम करते है !
हाथ पे भी खीर मलनी चाहिए क्योंकि हाथ काम करते है !
टांगो पे भी खीर मलनी चाहिए क्योंकि टाँगे चलती है !
नही, ऐसा करने से तो लोग हसेंगे !
कहेंगे कि बड़े मुर्ख हो, अरे ये सब करने की क्या जरूरत है !
मुख्य प्राण में जो कि मुख है उसमे भोजन दे दो
तो बाकि सब जगह आपने आप तृप्त हो जायेगी !
वैसे ही जो एक मात्र श्री कृष्ण है,
उनकी सेवा से आपने आप
माता, पिता, पुत्र, पति, आदि सब का कल्याण हो जाता है !
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एक बार ब्रह्मा जी ने प्रभु से पूछा कि आप कहाँ रहते हो ?
कोई कहता है कि भगवान बैकुंठ में रहते है
और कोई कहता है कि प्रभु धाम में रहते है !
भगवान उस के ह्रदय में रहते है जिस ह्रदय में भाव योग से
उस ह्रदय की सफाई की गयी हो !
अच्छी भावनाओं से ह्रदय को बुहारा हो !
अगर तुम भगवान को मिलना चाहते हो
तो तुम कही मत जाओ !
सिर्फ़ अपने मन को साफ करके सुंदर भावनाओं से सजा दो !
आपने आप प्रभु आ जायेंगे !
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कथा का पान करो !
कथा के अमृत के प्याले भर भर के पीओं !
सुनने से भक्त्ति बढेगी !
जैसे की कथा का अमृत कान में घुसा,
वैसे ही भक्त्ति इतनी बढेगी कि जिसका कोई अंत नही !
केवल कथा सुनने से ही चित शुद्व होता है !
कथा सुनने से, बिना कुछ किए ही अपने आप चित शुद्व हो जाता है !
कथा सुनने से बिना कुछ किए ही वैराग्य अपने आप मिल जाता है !
भगवद धाम की भी प्राप्ति इस से बिना कुछ किए ही सहज में हो जाती है !
गोकर्ण को बिना कुछ परिश्रम किये ही
सिर्फ़ कथा सुनने के प्रभाव से ही विमान धाम में लेने आ गया था !
अगर परमार्थ के रस्ते पे चलना है तो, आँखों से तुम ना कुछ देख सकते हो !
ना आँखों से कुछ समझ सकते हो !
तो फ़िर कैसे ?
आँखों से नही, पैरो से नही, दिमाग से नही, तो ?
केवल विशवास से !
विशवास कैसे मिलेगा ?
सिर्फ़ श्रवण से !
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चलती हुई व् मिटती हुई दुनिया में किसी की सता नही रही !
जो अपनी सता जमाने की कोशिश कर रहा है, वो तो निरामुर्ख है !
हम सोचते है कि हमारे पास शक्त्ति है !
हमारे पास शक्त्ति कहाँ है जब हम अपने ही शरीरी की
एक छोटी सी भी क्रिया को नही रोक सकते !
हम अपनी सता कैसे जमा सकते है,
जब हम अपने शरीर की भी सता को बना कर नही रख सकते !
अपना जीवन झूठी कमाई कमाने में मत लगाओ !
उस कमाई को कमाओ जो कभी भी नष्ट नही होती !
हर वस्तु संसार की तुमसे अलग होने बाली है,
भक्त्ति ही एक ऐसी कमाई है
जो कभी भी नष्ट नही होती !
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साधन ऐसे मत करो
कि एक घंटा जप या ध्यान किया और फ़िर सारा दिन आराम !
साधन ऐसा करो
कि प्रभु से चित एक क्षण के लिए भी अलग ना हो !
चित में हर क्षण निरंतर प्रभु का ध्यान रहे !
जब चित में हर क्षण प्रभु होंगे,
तो काम, क्रोध, लोभ, आदि निकट भी नही आ पायेंगे !
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हम जिनको अपना समझते है,
उनके विछुड़ने के पशचात कभी मिलन नही होगा !
माँ बाप के सामने बच्चा मर रहा है, वे बच्चे को बच्चा नही पाते !
मरने बाला मर के चला जाता है, और उसकी सहायता कोई नही कर सकता !
इतना होने पर भी हम प्रभु को नही भजते !
एक बच्चा जोर से रोता है तो माँ सब काम छोड़ कर पहुँच जाती है !
यही बात प्रभु के साथ है !
हम प्रभु को पुकारते नही !
हम में उत्कंठा, व् लालसा नही है, अन्यथा प्रभु दौडे चले आए !
अभी भी समझो !
उस प्रभु को पुकारो और पकडो जो अनंत काल तक काम आयेगा !
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द्वंदों से हमेशा डरते रहे !
कोंन सी बात या वस्तु हमारे मन में द्वंद उत्पन्न कर रही है,
उसे पहचान कर दूर करे !
जैसे आंधी व् तुफानो में भी पर्वत की चोटिया प्रभावित नही होती
और कूटस्थ की भांति खड़ी रहती है !
उसी प्रकार भगवान का भक्त्त किसी प्रकार की भी परिस्थितियों में
आस्था से खड़ा रहता है !
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अपने को समझना ही कठिन है संसार में !
आँख बाहर देख सकती है, पर स्वयम को नही देख सकती !
हमारी आध्यात्मिक यात्रा तभी प्रारम्भ होती है
जब हम अपने को देखना शुरू कर देते है !
अपने को देखने पर कमिया दिखेंगी !
अपनी कमियों पर संताप करने बाले का कभी नाश नही होता !
ऐसे लोग महापुरश बन जाते है !
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हमारा जिससे प्रेम है उसका स्वत चिन्तन होगा !
जब प्रभु में प्रेम हो जाता है
तो भजन करना नही पड़ता, भजन तो स्वत होगा !
भगवान किसी को कर्म, ज्ञान, या साधन से नही मिलेंगे !
भगवान तो केवल लगन से मिलेंगे !
जब बच्चा असहाए हो कर रोता है तो करुना से माँ अविलम्व चली आती है !
इसी प्रकार जब भक्त्त प्रभु को असहाए हो कर पुकारता है
तो प्रभु लगन से बुलाने पर कृपा करके चले आयेंगे !
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संत और असंत की परिभाषा ये है
कि संत तो चंदन वृक्ष है और असंत कुल्हाडी है !
दोनों ही अपना अपना स्वभाव नही छोड़ते !
कुल्हाडी चंदन के बृक्ष को काट देती है,
परन्तु चंदन अपनी सुगंध कुल्हाडी को दे देता है !
अर्थात मरते मरते भी संत परोपकार ही करता है !
प्रतिकार हिंसा संत में नही होती !
भक्त्त या संत तो इतने शीतल होते है कि चंदन भी उनके आगे कुछ नही !
कोई ब्यक्ति भवसागर से पार जाने बाला है,
उसकी पहचान ये है कि उसको सच्चा संत मिल गया है !
उसको सत्संग मिल गया है !
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प्रभु हर जीव के हित को दृढ़ करते रहते है !
प्रभु जैसा हितैषी हमारा कोंन होगा ?
उनकी हर क्रिया हमारे लिए मंगलकारी होती है और हमारे हित में होती है !
संसार सरकता जा रहा है हमारे हाथ से, फ़िर भी हम उसे पकड़ना चाहते है !
धन, श्री, एवं आसक्ति का मद हमे अन्धा बनाता रहता है !
प्रभु परिस्थिति उत्पन्न करके हमारी आँखे खोलते रहते है !
प्रभु दया करके जिस कारण से हम अंधे हो रहे है,
उस कारण को समाप्त कर देते है !
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प्रभु को ओर कोई नही बाँध सका
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प्रभु को वश में करने की केवल एक ही शक्त्ति है,
प्रेम शक्त्ति !
प्रेम के आधीन प्रभु के सब नियम बदल जाते है !
प्रभु सत्य से झूठ भी बोलने लग जाते है !
प्रभु अपने संकल्प लेकर उन्हें भी तोड़ देते है !
जो प्रभु की कृपा दृष्टि से अनंत सृष्टि का पालन होता है
वो ही प्रभु प्रेम में यशोदा के दूध के लिए रोता है !
जो प्रभु सब का पालन पोषण करता है,
वो ही प्रेम माखन के लिए घर घर चोरी करता है !
जिस प्रभु की प्रसनता के लिए योगी जन स्तुतिया करते है,
वो ही प्रभु प्रेम में गोपियों के नखरे उठाता है !
जब विधुर जी ने प्रभु को केला खिलाना चाहा तो प्रभु बोले
कि चाचा जैसा स्वभाव विदुरानी के छिलकों में था वैसा स्वाद आपके केलो में नही है !
प्रभु जीव का स्वाद नही देखता !
प्रभु तो केवल प्रेम का स्वाद देखते है !
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जिसको प्रभु के इलावा कोई दूसरी बात लाभ की दिखायी ही ना पड़े,
वो है भक्त्त !
भक्त्त का लक्ष्य केवल प्रभु होते है !
भगवद भक्त्त कभी भी संसार की प्रसन्नता के लिए नही
अपितु प्रभु की प्रसन्नता के लिए ही सब करता है !
बहुत से जीवो को प्रसन्न करना एक वैश्या वृति है !
केवल एक को ही प्रसन्न करो !
केवल श्री कृष्ण को ही प्रसन्न करो !
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प्रभु से मिलना वास्तव में कठिन नही है !
वे हमारी आत्मा है !
उन्हें कही ना आना है और ना कही जाना है !
वे तो हमे मिले ही हुए है !
हमारी मान्यता ने उन्हें अलग कर रखा है !
भगवान तो हमारी ओर उन्मुख है !
हमने ही पीठ कर रखी है, और खिलोनो से खेलने लगे हुए है !
विषय रूपी खिलोनो से मुहं फेर कर प्रभु की ओर मुख कर लो !
उनकी तरफ मुहं कर लो फ़िर उनकी कृपा का चमत्कार देखो !
उनके मिलने में जरा सी भी देर नही लगेगी !
अपनी समस्त मन, बुद्वि, इन्द्री, आदि का प्रवाह श्री कृष्ण की ओर जैसे ही मुड़ेगा ,
वैसे ही प्रभु मिलेंगे !
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भाव ही परिपक्व बनकर प्रेम बन जाता है !
भावोत्पति कैसे हो, इसी का नाम साधना है !
कोई पाठ करता है !
कोई कथा श्रवन करता है !
कोई जप करता है !
इन सब का एक रूप भावोत्पति है !
भाव बिना कोई भी साधन फल नही देता !
भगवान की ओर चलना है तो तीव्र गति से चलो !
ये तीव्र गति क्या है ?
जो भी साधन हम कर रहे है, वह भावनाओ के वेग से किया जाए !
भीलनी के वेर, सुदामा के तंदुल, व् विदुरानी के छिलके
इन सब में भावनाओ की तीव्रता थी !
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जिसको अपना सम्मान अच्छा लगता है
वहा तो अभी भक्त्ति की शुरुआत भी नही हुयी है !
भक्त्त तो प्रभु के चरणों की धूलि चाहता है !
भक्त्त तो इन्द्रपद को भी ठोकर मार देता है
फ़िर साधारण सम्मान उसे क्या लोभित करेगा !
त्यागी वही होगा जिसके अन्तकरण में भक्त्ति का
माने कृष्ण के प्रेम का बल होगा !
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ज्ञान चक्षुओं से सतत मन का निरिक्षण करते रहना चाहिए !
जागते हुए चोर नही आयेगा !
जागते हुए दोष उत्पन्न नही होगा !
मन का शांत होना बहुत जरुरी है !
जब हमारा मन शांत नही है उस समय हम प्रभु से दूर है !
जिसका मन जहा है वही उसका निवास होता है !
इसलिए मन की बीमारी को पकड़ना ही असली साधन है !
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शत्रु मित्र सब के साथ समान व्यवहार करे !
जैसे माँ कभी बच्चे में अभाव नही देखती, कभी भी दुर्गुण नही देखती !
जो शत्रु मित्र सब के साथ समान व्यवहार करते है,
वो ही इस संसार का पालन कर सकते है !
जैसे सूर्य, वायु, जल, पृथ्वी, आकाश आदि सभी के साथ समान व्यवहार करते है !
इनमे कोई पक्षपात नही है इसीलिए ये सभी के पालक है !
गंगा गंदे पानी को भी गंगा जल बनी देती है !
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जो स्वामी या पति होता है वही रक्षा करता है !
जो स्वयम निर्भय होगा, वो ही दुसरे की रक्षा कर सकेगा !
जो स्वयम काल का ग्रास होगा वह क्या किसी की रक्षा करेगा
और वह क्या किसी को अभय प्रदान करेगा !
स्वामी या पति तो केवल एक परमात्मा ही है, अन्य कोई नही !
रावन भी स्वामी नही बन सका जब की काल तो उसके महल में बन्धा था !
इसी लिए मीरा ने कहा था कि मेरे तो सिर्फ़ कृष्ण ही पति है !
मीरा ने कहा कि ऐसे वर को क्या वरु जो जन्मे मर जाए !
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गोपिया श्री कृष्ण से बोली कि तुम हमको अपने अधरामर्त से सींचो,
वो ही हमारे प्रेम की पूर्ति करने बाले है !
क्यो सींचो ?
क्योंकि हमारे ह्रदय में जो तुमसे मिलने की विरह अग्नि है,
प्रेमा अग्नि है, या कामा अग्नि है, तुम उसको सींचो !
आग में पानी डाल दो तो आग बुझ जाती है लेकिन उसे पानी से बुझाना नही है !
तुम इस आग में घी डाल दो और उसे ओर बड़ा दो !
बहुत से लोग ऐसा अर्थ करते है कि पानी से बुझा दो, नही !
ऐसे प्रेम बुझता नही है !
बुझाना मतलब नष्ट करना नही बल्कि सींचना !
सींचने से प्रेम की लता बढती है !
तुम्हारे अर्ध्रामारत से हमारा प्रेम बढेगा !
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अब गोपिया श्री कृष्ण को चनौती दे रही है
कि अगर तुम नही सींचोगे तो समझ जाओ ?
बोली हम एक नही जितनी भी है सब की सब,
तुम्हारे विरह की अग्नि में योग का प्रयोग करके शरीर को जला देंगी
और ध्यान के दवारा हे सखे तुम्हारे चरणों हम प्राप्त कर लेंगी !
तुम हमको छोड़ नही सकते हो !
ये चनौती है गोपियो की श्री कृष्ण को !
अन्त समय में जो जिसका ध्यान करता है उसको प्राप्त कर लेता है !
गीता में भी भगवान् ने कहा है
कि जो शरीर को छोड़ते समय जिसका स्मरण करता है, वो उसी को प्राप्त करता है !
मरते समय तुमने मानो गधा को याद किया तो सीधे गधा राम बन जाओगे !
इसीलिए गोपियों ने कहा पर तुम हमको छोड़ नही सकते हो
क्योंकि हम अपने विरह से शरीर को जला देंगी और ध्यान से तुम्हे प्राप्त कर लेंगी !
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भोग और ऐशवर्या की भावनाए सभी में छुपी रहती है !
इससे बचना केवल श्री कृष्ण कृपा से सम्भव है !
जब तक जीव अकिंचन नही बनता है
तब तक जीव को कृष्ण कृपा नही मिल सकती !
जीव कामनायों का दास बन जाता है !
जब तक भोग और ऐशवर्या में जीव का मन है,
तब तक वह प्रभु से बिमुख ही रहेगा !
घडे में अगर छोटा सा भी छिद्र होगा तो पानी सारा का सारा समाप्त हो जायेगा !
इसी प्रकार साधक को हमेशा समस्त विकारों से सावधान रहना चाहिए !
जो लोक व् परलोक दोनों को जला डालता है,
उसी का घर प्रभु के ह्रदय में बनता है !
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हमारे चारो ओर अंदर बाहर सर्वत्र ब्रह्म है
फ़िर भी हमे दिखायी नही दे रहा है !
जैसे किसी घोर अन्धकार में रखे हुए पानी को जीव कितना भी प्यासा हो
परन्तु प्राप्त नही कर सकता जब तक प्रकाश नही होगा !
वैसे ही हमारा अंतकरण घोर अंधकार में है !
प्रभु पास होते हुए भी नही दीखते है !
अन्धकार सिर्फ़ एक ही है कामावरण !
कामावरण ही प्रभु के स्वरूप को नही देखने देता है !
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संसार के जो लोकिक सम्बन्धी है,
पति, पुत्र, माता, पिता
कोई भी जीव किसी की आत्मा नही हो सकता !
माता है तो वो माता ही रहेगी !
उसकी आत्मा अलग है !
पुत्र की आत्मा अलग है !
स्त्री की आत्मा अलग है !
पति की आत्मा अलग है !
सबकी आत्मा अलग है इसलिए इन सब से सच्चा प्रेम नही होता !
स्वार्थ का प्रेम होता है !
सच्चा प्रेम आत्मा से होता है !
सबसे प्यारी आत्मा है और श्री कृष्ण सब की आत्मा है !
इसलिए श्री कृष्ण सब के बन्धु है !
श्री कृष्ण सब से अधिक प्यारे है !
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जीव चिन्तन करके अपनी प्रकृति का निर्माण स्वयम जैसा चाहे कर सकता है !
भगवान का स्मरण करेगा
तो भगवदकार चित वृति हो जायेगी !
विषयों का चिन्तन करेगा तो विष्याकर वृति हो जायेगी !
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साधना का मूल केन्द्र या मूल लक्ष्य मन होना चाहिए वरना साधन फल नही देगा !
किसी व्यक्ति ने कोटरी स्थित सर्प को मारने के लिए पुरे पेड़ को काट दिया
तो क्या उससे सर्प मर गया !
नही, सर्प नही मरा !
उसी तरह मन का नियन्त्रण यदि नही हुआ तो साधन व्यर्थ चला जाएगा !
कोई भी साधन बिना मन के नही हो सकता !
किसी भी तरह अपने मन को प्रभु में लगा दो !
मन प्रभु में लगते ही प्रभु भक्त्त के सामने खड़े हो जायेंगे !
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गोपिया कहती है कि श्याम तेरी भुजाये कैसी है ?
श्याम तेरी भुजाये अभय देने बाली है !
जो शरण में आ गया उसे ही अभय कर देती है !
कितने ही ब्रज में राक्षस आए !
सबसे अभय दान दे दिया तुमने ब्रज बासियो को !
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प्रभु के प्रत्येक अंग को कमल क्यो कहा जाता है
जैसे चरण कमल, नेत्र कमल, हस्त कमल एव नील कमल ?
क्योंकि एक तो प्रभु की कोमलता कमल जैसी होती है !
दुसरे भक्त्तो के नेत्र भौरे होते है, और प्रभु का मुख कमल होता है !
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दुःख सुख जो रुलाते है और हंसते है, यही अंधकार की जड़ है !
दुःख में चीखना चिल्लाना प्रभु के विधान में असंतोष व्यक्त करना है !
भक्त्ति योग में स्थित भक्त्त तो प्रत्येक स्थिति में प्रभु इच्छा मान कर संतुष्ट रहता है !
प्रभु से मांगो मत !
तुम्हारे मांगने का अर्थ है कि प्रभु जानते नही!
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जहाँ प्रेम होगा, वही टेडा पन भी अवश्य होगा क्योंकि प्रेम सर्प की भांति होता है !
सर्प कभी भी सीधा नही चलता !
गोपिया जी भर के श्याम को गलिया देती है
परन्तु ह्रदय से नही निकाल पाती थी श्याम को !
क्योंकि लड़ना व् खीजना उसी से होता है जिससे प्रेम होता है !
गोपिया कोई जप या तप नही करती थी,
परन्तु घर के सब कार्यो को करते समय कृष्ण प्रेम के गीत गाती रहती थी !
इसी से बो प्रभु की प्यारी बन गई !
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अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूंछा कि आपका गोपियों से क्या सम्बन्ध है?
भगवान बोले कि गोपियाँ हमारी माता, पिता, स्त्री, सब हैं !
वो हमारी गुरु भी हैं और शिष्या भी हैं!
हमारी सबसे बड़ी हितैषी भी ये ही हैं !
जब ब्रह्मा सब गोप बछड़ों को चुरा ले गए थे
तब हमने शिशु बन उनका दूध भी पिया !
ये पूंछो कि गोपियों से हमारा क्या सम्बन्ध नहीं है !
गोपियाँ हमारी सब ओर से सब कुछ बन गई हैं !
सम्बन्ध ना संसार में कोई था और ना कोई ऐसा होगा !
मेरे महत्व को, मेरी श्रद्धा को, मेरी गति को, मेरे तत्व को,
जितना सब तरह से गोपियाँ जानती हैं उतना कोई भी नहीं जानता !
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प्रभु को यदि पाना है
तो सब आसक्तियों व् कामनाओ को छोड़ कर निर्वैर हो जाओ,
प्रभु शीध्र मिल जायेंगे !
जिसे एक गिलास पानी की भी आवश्यकता ना हो ,
और किसी से बात करने या बोलने की अपेक्षा ना हो,
तब भक्त्त शान्त और निर्भय हो जाता है !
जैसे वर्षा पड़ने पर घास स्वत उत्पन हो जाती है,
उसी तरह आसक्तियो व् कामनाओ को छोड़ने पर चारो ओर फ़िर प्रभु ही दिखाई देंगे !
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भगवान का जो भजन करता है, भगवान उसका भजन करते है !
जितनी तुम्हारी शरणागति है उतना ही भगवान भी तुम्हारा भजन करता है !
सच्चा भजन तो भगवान ही भक्त्त का करता है !
वारह पुराण में लिखा है कि जिस समय जीव मरने लगता है
तो उस समय वो भजन नही कर पाता !
उसकी जीव रुक जाती है और वो वेहोश हो जाता है !
तब भगवान ही उसके लिए भजन करते है !
तब उसका कल्याण हो जाता है !
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प्रभु का अनुगृह तथा निगृह
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यदि प्रभु जीव को कुछ ना दे तो, उसमे भी प्रभु की कृपा ही है !
प्रभु का अनुगृह तथा निगृह दोनों ही प्रभु की कृपा है !
हमारी इच्छा पुरी हो, ऐसा सोचना ना भक्त्ति है और ना प्रेम है !
संसारी जब धन प्राप्त करते है तो सोचते है कि प्रभु की बड़ी कृपा हो गयी !
ये ग़लत है !
ये प्रभु की नही माया की कृपा है !
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